निराला के काव्य में दार्शनिकता
Abstract
हिन्दी साहित्य के आधुनिक युग के छायावादी साहित्य धारा के प्रमुख साहित्य सृजक सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ के साहित्य में दार्शनिकता, वेदान्त, अद्वैतवाद और मानवतावाद का गहरा पुट है जो छायावादी रहस्यवाद से प्रगतिवादी यथार्थवाद तक विकसित हुआ। उनकी रचनाओं में आत्मा-परमात्मा का संबंध, माया से मुक्ति और सर्वहारा वर्ग के प्रति करुणा का स्वर प्रमुख है। ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘सरोज स्मृति’ जैसी रचनाओं में उनकी दार्शनिक वैचारिकता के संघर्ष दिखाई देते हैं। ‘निराला’ पर स्वामी विवेकानन्द के वेदान्त दर्शन का गहरा प्रभाव रहा जो ब्रह्म की सत्ता और जीव (मानव) को ही ईश्वर का रूप मानता है। निराला के प्रारंभिक साहित्य में, विशेष रूप से ‘परिमल’ और ‘अनामिका’ में आत्मा का परमात्मा से मिलन की तड़प और प्रकृति में असीम की झलक दिखाई देती है। निराला ने अपने साहित्य में सांसारिक माया को भ्रांतियों का कारण माना है। ‘राम की शक्ति पूजा’ में वे संघर्ष के माध्यम से इस माया आवरण को हटाकर विजय का घोष करते हैं। ‘सरोज’ भावात्मक दृष्टि से मूर्त रूप चित्रण का उत्कृष्ट उदाहरण है।