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“भारतीय ज्ञान परंपरा में योग की समकालीन प्रासंगिकता: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन”

डॉ नितेश्वर चतुर्वेदी
Published November 1, 2026, Volume 3, Year 2026

Abstract

भारतीय ज्ञान परंपरा मानव जीवन को शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और चेतना के समाहित रूप में देखने के साथ-साथ स्वीकार भी करती है। इस परंपरा में योग केवल शारीरिक व्यायाम या आसनों का अभ्यास नहीं, बल्कि आत्मानुशासन, मानसिक संतुलन, नैतिक जीवन और आध्यात्मिक उन्नति की समग्र प्रक्रिया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में वैदिक साहित्य, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता, पतंजलि योगसूत्र तथा हठयोग-ग्रंथों के आधार पर योग की समकालीन प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है। वर्तमान समय में तनाव, चिंता, एकाकीपन, अनियमित जीवनशैली, मनोदैहिक समस्याओं, सामाजिक असहिष्णुता और पर्यावरणीय संकट जैसी चुनौतियाँ व्यापक रूप से दिखाई देती हैं। भारतीय योग-दृष्टि इन समस्याओं को केवल शारीरिक स्तर पर नहीं, बल्कि जीवन के अनेक परस्पर संबंधित स्तरों पर समझने का अवसर देती है। तैत्तिरीयोपनिषद् का पंचकोश सिद्धांत समग्र स्वास्थ्य की व्याख्या के लिए एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक ढाँचा प्रस्तुत करता है। पतंजलि के चित्तवृत्ति-निरोध, मैत्री-करुणा और यम-नियम के सिद्धांत मानसिक स्वच्छता तथा सामाजिक नैतिकता को दिशा देते हैं। गीता का कर्मयोग कर्तव्य, समत्व और निष्काम कर्म का संदेश देता है। यह अध्ययन शास्त्रीय ग्रंथों के पाठ-विश्लेषण और वैचारिक विवेचन पर आधारित है। निष्कर्षतः योग को शिक्षा, स्वास्थ्य-जागरूकता, कार्यस्थल, परिवार और सामुदायिक जीवन में विवेकपूर्ण ढंग से अपनाना व्यक्ति तथा समाज के कल्याण में सहायक हो सकता है। यह अध्ययन वैचारिक है; इसमें कोई नया नैदानिक प्रयोग या सांख्यिकीय सर्वेक्षण प्रस्तुत नहीं किया गया है। गीता 2.50 का कथन—“योगः कर्मसु कौशलम्”—कर्म में कुशलता के विचार को सामने रखता है। आधुनिक कार्यस्थल में इसका आशय कार्य के प्रति सजगता, समय का विवेकपूर्ण उपयोग, नैतिक निर्णय, निरंतर सीखना और कठिन परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखना हो सकता है। कर्मयोग व्यक्ति को अपने दायित्वों से पलायन करने के बजाय उन्हें सजगता से निभाने की प्रेरणा देता है। साथ ही यह स्मरण कराता है कि व्यक्ति को अपने प्रयासों की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए और परिणामों के प्रति अनावश्यक आसक्ति से बचना चाहिए।

Keywords

मुख्य शब्द (Keywords): भारतीय ज्ञान परंपरा योग दर्शन पंचकोश सिद्धांत पतंजलि योगसूत्र श्रीमद्भगवद्गीता प्राणायाम मानसिक स्वास्थ्य कर्मयोग नैतिकता समग्र स्वास्थ्य।